Friday, 29 November 2013

पुरुषों में पुरुषवादी सोच विधाता की नासमझी है।

बाजार में,जी हाँ बाजार में

मिलती हैं तरह तरह की नेल पॉलिशें,

जहाँ तय किये जाते हैं सौंदर्य शास्त्र के सिद्धांत।

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कौन सा रंग किस राशि के पुरुषों को उत्तेजित करेगा

यह चिंतन यहाँ शाश्वत भाव में विराजता है,

यह गुलाबी है, अभी अभी नौजवान हुए लड़के इसमें संगीत सूँघ सकते हैं,

और यह गहरा हरा, पिता - तुल्य प्रेमियों की पहली पसंद।

लम्बी - छरहरी नाखूनों पर ये पॉलिशें विधाता को आश्वस्त करती हैं

"कायम  रहेगा रोमांस ताउम्र"

बावजूद इसके कि कामदेव जला दिया गया है

पहले, बहुत - बहुत पहले।

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नहीं, मुझे रंगों के आकर्षण से बचना होगा,

लेकिन कोई मुझे उत्तर क्यों नहीं देता

ये आकर्षण रचे क्यों जाते हैं ?

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सोच बदलो, इन पुरुषवादी विचारों से उबरों मेरे मित्र !

समय का तकाजा है

पुरुषों में नारीवादी और नारियों में पुरुषवादी सोच बो दो।

विधाता को बताओ कि गलती उसकी है

"पुरुषों में पुरुषवादी सोच  विधाता की नासमझी है।"

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सभ्य समाज में पुरुषों को सभ्य और स्त्रियों को आकर्षक होना हीं चाहिए

ताकि बाजार का अर्थशास्त्र "तेजपालों" को जन्म दे सके।

वैसे मैं आपसे भी सहमत हूँ

कि इन नेल पालिशों का "तेजपालों" और "आसा- रामों" से कोई सम्बन्ध नहीं है।

....................... सरोज कुमार

Sunday, 13 October 2013

कविता ने कवि से लाकर पाठक को क्या दिया ?

कविता ने कवि से लाकर पाठक को क्या दिया ?
जो भी दिया सरकार मेरे अहसास हीं तो था.

मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?

मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?
नहीं नहीं ऐसा मत करना.
मुझपर, यह उपकार तुम्हारा.
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यह एकांग बनेगा तो तुम स्वामी बनना चाहोगे
और स्नेह के बदले में अपनी पूजा करवाओगे
मैं तो कटु - मधु दोनों में आजाद ख्यालों का पंछी.
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मैं विलुप्त सरिता का रज - कण
मुझमें नीरवता का क्रंदन
मुझे रौंद अपने चरणों से तुम अपने घर को चल दोगे.
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मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?
नहीं-नहीं ऐसा मत करना
मैं उपकार नहीं ले सकता.

चाहत का रंग कैसा था ?

आज कौन आई ?
सोया था मैं
पता नहीं पाया.
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कोसों की थकन
चूर हुईं सांसें
बिखरी हुई आसें
चुका नहीं पाईं
सरक गया अवसर
हाथ छूंछा
गया नहीं पूछा
कि चाहत का रंग कैसा था ?

.............सरोज कुमार 

Saturday, 9 March 2013

बहुत शोर है लोकतंत्र के मंदिर में भई

बहुत शोर है लोकतंत्र के मंदिर में भई
बेबा रोती कहीं, कहीं पर रोते बच्चे,
कुछ हैं जो आश्वासन पाते,
कुछ तो बस रोते रह जाते
कुछ हैं जो बस कफ़न बेचते
कुछ हैं बस कहकहे सेंकते।
आएगी एक दिन वह आंधी भी आएगी,
कोलाहल से ऊब चुकी ये रातें भी सो जायेंगी।

Sunday, 3 February 2013

यह दीवानापन नहीं उद्देश्य तेरा

यह दीवानापन नहीं उद्देश्य तेरा
और ना हीं हम है कायल
प्यार में मरने के हरगिज।
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जो सहज हो जिन्दगी उससे बना लो,
यह नहीं कि चीज
जो बिकती नहीं
हम जिद उसी की ठान बैठें।
हम स्वयं के लिए जीते है
मगर
कुछ और भी सध जाय तो अच्छा वही है।
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खुल सको तो खुलो, कह दो
यह रही पसंद तेरी,
मगर जिद तो नहीं अच्छी
क्योकि दृष्टि दूर तक
तेरी अभी जाती नहीं है।
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अभी बचपन है तुम्हारा संग तेरे
और उद्बुद कामना है
इसलिए इस पल किसी को चाहना बिलकुल मना है।

Sunday, 27 January 2013

यह जीवन पथ मैं राही
कहीं कहीं छाया सघन
लेकिन विश्राम मनाहीं.
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आश की डोरी रही जबतक तनी
चाह चलने की रही तबतक बनी
आश का संबल तनिक शिथिल हुआ
पग हुए विश्रांत,
नहीं मिलता मुझे विश्राम-स्थल
ढूंढता हूँ बीथियों में मैं तृषित सा
अंक वह जिसमें लिखा सन्देश
चरैवेति - चरैवेति.
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चाह कर भी रुक नहीं पता कहीं
और चलने की रही इच्छा नहीं
पर नियति का खेल -
मैं चलता रहा.
तथ्य जीवन के मगर गुनता रहा.
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यह महज मेरी नहीं,
सबकी व्यथा है
यह नियति का खेल सचमुच है नहीं
यह मनुज के हार की सुन्दर कथा है
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और है इसका सहज परिणाम
कुछ गुनना पड़ेगा.
त्रस्त मानव के ह्रदय में
जीत का उन्माद
भरना पड़ेगा.
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एक नूतन नीति का निर्माण
फिर से सत्य का संधान
अकेले एक क्षण का कर्म है क्या ?
रे नहीं.
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इसलिए आओ चलें सब साथ मिलकर
एक का आश्रय बने हर एक.
ऐसा करें हो जाएँ पूरी
हर इच्छा मनचाही
यह जीवन पथ मैं राही.
अभी अभी कुम्भ में स्नान कर पवित्र हो चुका एक देश
मस्जिद में वजू कर रहा था
कि 'वन्दे मातरम' गाते कुछ लोग वहां से गुजरे
बाद में क्या हुआ पता नहीं
अभी एक समाचार आया है,
-
"कुछ आतंकवादी एक भूला - बिसरा गीत गाते हुए पकडे गए।"

जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप थे

जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप थे
उन्होंने भी
झंडा फहराया
और अपनी राष्ट्रभक्ति का लोहा मनवाया।

कुछ करते हैं कवि सम्मलेन

नारद को देखकर ग़मगीन
किसी द्वंद्व-चिंतन में लीन,
पूछा महर्षि व्यास ने
कैसा रहा सफ़र ? देवर्षि !
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चिंता की रेखाएं फैलीं
कनपट्टी के कोरों तक
सर्द - सनसनी हिलकोर गयी
मासामों तक पोरों तक.
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बोले कुछ भर्राए स्वर में -
"महाकाव्य का विषय नहीं यह
कविवर ! यह कलिकाल - केलि की अंतर्धारा
अख़बारों में एक दिवस का समाचार है
फिर भी सुनिए यह बुरा हाल "
है भरतखंड का यह सवाल-
अभिमन्युओं के शीश पर मंडरा रहा है काल
यहाँ सड़कों पर उतरा हुआ बचपन
चीखता चिल्लाता नारे लगाता
*मेरा 'किसलय " वापस दो
बचपन को आश्वस्त करो "
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राजभवन तक की गुहार
मानव श्रृंखला बनाई
किया मनुहार.
राष्ट्रपति को किया ई -मेल सन्देश
" बचपन परतंत्र है
भारत मना रहा गणतंत्र है."
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बच्चों ने की है भूख हड़ताल
अपहरण का फैला हुआ जाल
वे पहुंचे मुख्यमंत्री आवास
बोले- " तुम हो त्राता
कुछ तो दो उत्तर"
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वे बोले -
"अपहरण मैंने किया होता तो मेरे बस में था,
लेकिन यह तो अपहर्ताओं के रहमोकरम पर,
मैं प्रार्थना करूंगा सब ठीक हो !"
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जब मौन हुए देवर्षि
पूछा व्यासदेव ने -
" और वे क्या कर रहे ?
अभिभावक, पिता परिजन ?
"अपहर्ताओं से मोल- तोल "
-नारद जी धीमे से बोले.
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और वे बुद्धिजीवी समाजसेवी ?
वे क्या कर रहे?
व्यासदेव ने फिर से पूछा.
एक क्षण रहकर मौन, लिए विद्रूप हँसी नारद जी बोले -
" कुछ तो चंदा उठा रहे है
कुछ करते हैं कवि सम्मलेन."