यह जीवन पथ मैं राही
कहीं कहीं छाया सघन
लेकिन विश्राम मनाहीं.
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आश की डोरी रही जबतक तनी
चाह चलने की रही तबतक बनी
आश का संबल तनिक शिथिल हुआ
पग हुए विश्रांत,
नहीं मिलता मुझे विश्राम-स्थल
ढूंढता हूँ बीथियों में मैं तृषित सा
अंक वह जिसमें लिखा सन्देश
चरैवेति - चरैवेति.
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चाह कर भी रुक नहीं पता कहीं
और चलने की रही इच्छा नहीं
पर नियति का खेल -
मैं चलता रहा.
तथ्य जीवन के मगर गुनता रहा.
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यह महज मेरी नहीं,
सबकी व्यथा है
यह नियति का खेल सचमुच है नहीं
यह मनुज के हार की सुन्दर कथा है
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और है इसका सहज परिणाम
कुछ गुनना पड़ेगा.
त्रस्त मानव के ह्रदय में
जीत का उन्माद
भरना पड़ेगा.
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एक नूतन नीति का निर्माण
फिर से सत्य का संधान
अकेले एक क्षण का कर्म है क्या ?
रे नहीं.
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इसलिए आओ चलें सब साथ मिलकर
एक का आश्रय बने हर एक.
ऐसा करें हो जाएँ पूरी
हर इच्छा मनचाही
यह जीवन पथ मैं राही.
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