............क्योंकि मैं सोंचता हूँ.
Friday, 29 November 2013
Sunday, 13 October 2013
कविता ने कवि से लाकर पाठक को क्या दिया ?
कविता ने कवि से लाकर पाठक को क्या दिया ?
जो भी दिया सरकार मेरे अहसास हीं तो था.
मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?
मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?
नहीं नहीं ऐसा मत करना.
मुझपर, यह उपकार तुम्हारा.
************
यह एकांग बनेगा तो तुम स्वामी बनना चाहोगे
और स्नेह के बदले में अपनी पूजा करवाओगे
मैं तो कटु - मधु दोनों में आजाद ख्यालों का पंछी.
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मैं विलुप्त सरिता का रज - कण
मुझमें नीरवता का क्रंदन
मुझे रौंद अपने चरणों से तुम अपने घर को चल दोगे.
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मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?
नहीं-नहीं ऐसा मत करना
मैं उपकार नहीं ले सकता.
चाहत का रंग कैसा था ?
आज कौन आई ?
सोया था मैं
पता नहीं पाया.
********
कोसों की थकन
चूर हुईं सांसें
बिखरी हुई आसें
चुका नहीं पाईं
सरक गया अवसर
हाथ छूंछा
गया नहीं पूछा
कि चाहत का रंग कैसा था ?
.............सरोज कुमार
Saturday, 9 March 2013
बहुत शोर है लोकतंत्र के मंदिर में भई
बहुत शोर है लोकतंत्र के मंदिर में भई
बेबा रोती कहीं, कहीं पर रोते बच्चे,
कुछ हैं जो आश्वासन पाते,
कुछ तो बस रोते रह जाते
कुछ हैं जो बस कफ़न बेचते
कुछ हैं बस कहकहे सेंकते।
आएगी एक दिन वह आंधी भी आएगी,
कोलाहल से ऊब चुकी ये रातें भी सो जायेंगी।
बेबा रोती कहीं, कहीं पर रोते बच्चे,
कुछ हैं जो आश्वासन पाते,
कुछ तो बस रोते रह जाते
कुछ हैं जो बस कफ़न बेचते
कुछ हैं बस कहकहे सेंकते।
आएगी एक दिन वह आंधी भी आएगी,
कोलाहल से ऊब चुकी ये रातें भी सो जायेंगी।
Sunday, 3 February 2013
यह दीवानापन नहीं उद्देश्य तेरा
यह दीवानापन नहीं उद्देश्य तेरा
और ना हीं हम है कायल
प्यार में मरने के हरगिज।
******
जो सहज हो जिन्दगी उससे बना लो,
यह नहीं कि चीज
जो बिकती नहीं
हम जिद उसी की ठान बैठें।
हम स्वयं के लिए जीते है
मगर
कुछ और भी सध जाय तो अच्छा वही है।
********
खुल सको तो खुलो, कह दो
यह रही पसंद तेरी,
मगर जिद तो नहीं अच्छी
क्योकि दृष्टि दूर तक
तेरी अभी जाती नहीं है।
********
अभी बचपन है तुम्हारा संग तेरे
और उद्बुद कामना है
इसलिए इस पल किसी को चाहना बिलकुल मना है।
और ना हीं हम है कायल
प्यार में मरने के हरगिज।
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जो सहज हो जिन्दगी उससे बना लो,
यह नहीं कि चीज
जो बिकती नहीं
हम जिद उसी की ठान बैठें।
हम स्वयं के लिए जीते है
मगर
कुछ और भी सध जाय तो अच्छा वही है।
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खुल सको तो खुलो, कह दो
यह रही पसंद तेरी,
मगर जिद तो नहीं अच्छी
क्योकि दृष्टि दूर तक
तेरी अभी जाती नहीं है।
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अभी बचपन है तुम्हारा संग तेरे
और उद्बुद कामना है
इसलिए इस पल किसी को चाहना बिलकुल मना है।
Sunday, 27 January 2013
यह जीवन पथ मैं राही
कहीं कहीं छाया सघन
लेकिन विश्राम मनाहीं.
********
आश की डोरी रही जबतक तनी
चाह चलने की रही तबतक बनी
आश का संबल तनिक शिथिल हुआ
पग हुए विश्रांत,
नहीं मिलता मुझे विश्राम-स्थल
ढूंढता हूँ बीथियों में मैं तृषित सा
अंक वह जिसमें लिखा सन्देश
चरैवेति - चरैवेति.
*********
चाह कर भी रुक नहीं पता कहीं
और चलने की रही इच्छा नहीं
पर नियति का खेल -
मैं चलता रहा.
तथ्य जीवन के मगर गुनता रहा.
*********
यह महज मेरी नहीं,
सबकी व्यथा है
यह नियति का खेल सचमुच है नहीं
यह मनुज के हार की सुन्दर कथा है
***********
और है इसका सहज परिणाम
कुछ गुनना पड़ेगा.
त्रस्त मानव के ह्रदय में
जीत का उन्माद
भरना पड़ेगा.
********
एक नूतन नीति का निर्माण
फिर से सत्य का संधान
अकेले एक क्षण का कर्म है क्या ?
रे नहीं.
*********
इसलिए आओ चलें सब साथ मिलकर
एक का आश्रय बने हर एक.
ऐसा करें हो जाएँ पूरी
हर इच्छा मनचाही
यह जीवन पथ मैं राही.
कहीं कहीं छाया सघन
लेकिन विश्राम मनाहीं.
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आश की डोरी रही जबतक तनी
चाह चलने की रही तबतक बनी
आश का संबल तनिक शिथिल हुआ
पग हुए विश्रांत,
नहीं मिलता मुझे विश्राम-स्थल
ढूंढता हूँ बीथियों में मैं तृषित सा
अंक वह जिसमें लिखा सन्देश
चरैवेति - चरैवेति.
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चाह कर भी रुक नहीं पता कहीं
और चलने की रही इच्छा नहीं
पर नियति का खेल -
मैं चलता रहा.
तथ्य जीवन के मगर गुनता रहा.
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यह महज मेरी नहीं,
सबकी व्यथा है
यह नियति का खेल सचमुच है नहीं
यह मनुज के हार की सुन्दर कथा है
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और है इसका सहज परिणाम
कुछ गुनना पड़ेगा.
त्रस्त मानव के ह्रदय में
जीत का उन्माद
भरना पड़ेगा.
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एक नूतन नीति का निर्माण
फिर से सत्य का संधान
अकेले एक क्षण का कर्म है क्या ?
रे नहीं.
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इसलिए आओ चलें सब साथ मिलकर
एक का आश्रय बने हर एक.
ऐसा करें हो जाएँ पूरी
हर इच्छा मनचाही
यह जीवन पथ मैं राही.
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