क्रांति
भले क्रांति हो भ्रान्ति मगर यह जोश हमें दे देती है,
यह घुटकर जीने के विरुद्ध आक्रोश हमें दे देती है
एक ज्वाला - मुख बेचैन यहाँ हम सबके दिल में पलता है
'सब मौन खड़े' - बस यही सोंच वह कब से नहीं मचलता है.
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एक चीख कहीं से उठे और मातम सा शोर मचा जाये
एक चीख कहीं दब जाय और सन्नाटे का भ्रम रचा जाये
- इन दो स्थितियों में बोलो, है कौन तुम्हारा हितोपाय ?
चुप रहना सभ्य कला है तो एक चीख क्रांति का है उपाय.
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एक 'चिंतन' जैसी चीज कोई जब तक है नहीं रची जाती
'क्रांति - क्रांति' चिल्लाने से सच है कि क्रांति नहीं आती,
जब तक विकल्प तुम खड़ा नहीं कर देते हो इस 'खंडहर' का
नारों से छली गयी जनता तब तक विश्वास नहीं पाती.
एक चीख कहीं दब जाय और सन्नाटे का भ्रम रचा जाये
- इन दो स्थितियों में बोलो, है कौन तुम्हारा हितोपाय ?
चुप रहना सभ्य कला है तो एक चीख क्रांति का है उपाय.
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एक 'चिंतन' जैसी चीज कोई जब तक है नहीं रची जाती
'क्रांति - क्रांति' चिल्लाने से सच है कि क्रांति नहीं आती,
जब तक विकल्प तुम खड़ा नहीं कर देते हो इस 'खंडहर' का
नारों से छली गयी जनता तब तक विश्वास नहीं पाती.
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