Saturday, 22 September 2012

मैं चौराहा नहीं हूँ

मैं चौराहा नहीं हूँ
जहाँ विज्ञापन टांग दिए जायेंगे.
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चौराहे का दर्द वैश्विक है
वह बदलते पोस्टरों का चेहरा है जहाँ गरीबी नहीं झांकती
वहां प्रधानमंत्री को गाली देते लोग गर्व - पूर्वक गुजरते हैं
और यातायात पुलिस इसे मुस्कुराते हुए महसूसती है
उसे सकून है कि वह राज्य की पुलिस है देश की नहीं.
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ऐसा नहीं कि नैतिकता-प्रिय पुरुष वहाँ नहीं आते
लेकिन चुप रहकर अनेकों सवालों की इज्जत बचाना उनकी जिम्मेवारी है
अपनी सुरक्षा प्रबंधों से आश्वस्त होने के उपरांत
वे कभी - कभार किसी तथाकथित शहीद के गले में मुरझाये फूलों की माला डालते हुए
कैद कर लिए जाते हैं तस्वीरों में अख़बार की सुर्खियाँ बनने हेतु,
चौराहा मुस्कुराता है
छल को जितना वह पहचानता है उतना कोई नहीं.
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मैं यहाँ खड़ा हूँ जिसे सब चौराहा कहते हैं
मैं बस खड़ा हूँ
बस इस कारण कभी - कभी चौराहा समझ लिया जाता हूँ
मुझपर सबकी इनायत है,
उन नीतियों को
जिसे बाहर से विरोध करने के बाद अन्दर से समर्थन दिया गया
यहाँ सम्मानित किया जाना है
गुजरता हुआ आज और गुजरा हुआ कल नसीहत भर है
और आनेवाला कल
विद्रोही - बूटों से पीसने की उम्मीद में दुबला हो रहा है,
ऐसे हीं किसी वक्त में मुझे मोक्ष लेना है
कौन जाने कल यह चौराहा रहे, न रहे.
................ सरोज कुमार

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