खुश होने के अनेक कारणों में एक है - न्यायालय का होना
और उसी समय दुखी होने का एक कारन है न्याय का न होना.
न्यायालय की भूमिका अब कम हो चली है,
इससे पूर्व की न्यायालय समझ पाता कि सरकारी दलीलों में सत्यांश कितना है
गरीबों की श्रेणी से अचानक ऊपर उठे अंगूठे समझ जाते हैं कि अदालत क्या कहेगी.
वादी और प्रतिवादी समझ जाते हैं कि न्याय ठीक उसी समय क्यों उपस्थित हुआ
जब सरकार को मुंह खोलने के लिए एक मुद्दे की जरूरत थी.
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अभी कल हीं उन्होंने अपनी ख़ामोशी से अनेकों सवालों की आबरू बचाई थी
और आज न्याय आ खड़ा हुआ गुजरात के दंगों और मुंबई में विदेशी हमलों के बीच तालमेल बैठाता हुआ,
गोया
वादी और परिवादी के बीच का एक खेल
देश में उगाये गए सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष तमाशबीनों की तालियों का मोहताज हो.
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न्याय का स्वतंत्र होना हीं पर्याप्त नहीं है उसका स्वतंत्र दीखना भी हमारी आकांक्षाओं में शामिल है.
न्याय के ऊपर भी है कोई जो पहले संसद का नुमाइंदा था और जिसे किसी और का अंगूठा होने पर नाज होता है
और जिसने सोते - सोते सर्वोच्चता हासिल की है
और वह लंगड़ी जनाकांक्षा से ऊपर न उठने को हीं अपना पुरुषार्थ समझ रखा है
जो स्वतंत्र है अपने अधिकार का उपयोग करे या न करे
अथवा अपना अधिकार उस बिल्ली को सौंप दे जिसके लिए छींके की उंचाई उसकी औकात से ज्यादा ऊँची है.
न्याय के ऊपर भी कोई है जो न्याय को पलट सकता है और वह दुर्भाग्य से अपनी औकात नहीं पहचानता.
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इधर सन्नाटे में भी एक प्रश्न रह - रह चीखता है -
फेसबुक पर मुर्दनगी क्यों छा गयी ?
सरोज कुमार, 30 /08 /2012
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