Thursday, 27 September 2012

आम आदमी और मैं

आम आदमी : राम -राम भाई !
मैं - राम राम ! कांग्रेस वालों के यहाँ से कब लौटे ?
आम आदमी : मैं कहाँ गया था उनके पास ? मैं तो सुबह से पत्थर तोड़ रहा था.
मैं : लेकिन कांग्रेस वाले चिल्ला रहे थे - "कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ " तो मैंने सोंचा तुम उनसे हाथ मिला रहे होगे.
आम आदमी : आप भी साहब बहुत घुमा कर फेंकते हो ? मैं तो जरूरत बस आपसे मिलने चला आया ?
मैं : मुझसे क्या जरूरत आन पड़ी. रहने के लिए इंदिरा आवास, खाने के लिए कम कीमत का अनाज, जवाहर रोजगार योजना से रोजगार बाल - बच्चों के लिए मुफ्त का सरकारी स्कूल, दोपहर की खिचड़ी, समाचार के लिए रेडिओ और टेलीविजन सब कुछ तो दे रही है सरकार और कभी बीमार पडो तो तीस हजार तक का स्वास्थ्य बीमा, अब इसके अलावे कौन जरूरत आ पड़ी ? और भी कई योजनायें है - जननी सुरक्षा योजना, मुफ्त कंडोम से लेकर मुफ्त आपरेशन ऊपर से दवाई का खर्चा और - और भी बहुत कुछ मुझे तो सब मालूम भी नहीं .
आम आदमी : मैं ईमानदार आदमी हूँ साहब, मुझे गाली मत दिया करो. मैं मुफ्त का माल हराम का समझता हूँ. बस मजूरी से जो मिलता है उससे जी लेता हूँ.
मैं : लेकिन ये योजनायें तो तुम्हारे हक़ की चीज है. कानून सम्मत है. हराम का कैसे ?
आम आदमी : हक़ की चीज होती तो लाइन लगाना नहीं पड़ता, मुखिया की जी हुजूरी नहीं करनी पड़ती, और जब वे वोट मांगने आते तो यह नहीं गिनाते की चापाकल लगवा दिया तुम्हारे दरवाजे पर और बी . पी. एल में नाम लिखवा दिया. आप नहीं जानते साहब तब कितना बुरा लगता है जब वे अपनी दयानतदारी दिखाते हैं. लगता है दुनिया का सबसे दबा हुआ आदमी मैं हीं हूँ.
मैं : तो तुम क्या चाहते हो ?
आम आदमी - बस यही कि मुझे आम से खास बनने का रास्ता बता दो. वे मेरे हिस्से से कमीशन भी काट लेते हैं और अहसान भी जताते हैं.
मैं : मतलब ?
आम आदमी : यह कि मेरे हिस्से की चीज सीधे मेरे हाथ में थमा दो.
मैं : तो तुम्हारा खाता नहीं खुला क्या ?
आम आदमी : आप फिर नहीं समझे मेरी बात. मेरे श्रम का उचित मूल्य नहीं मिलता. पूरे दिन ईमानदारी से जी - तोड़ मेहनत करने पर भी मुझे सरकार के आगे हाथ फैलाना पड़ता है. मेरे दिन भर के श्रम का उचित मूल्य मिल जाता तो मुझे हाथ क्यों फैलाना पड़ता ?
मैं : इसका मतलब यह कि तुममे खुद्दारी जग रही है. लेकिन वो जो तुम्हारे श्रम का मूल्य चुराता है वह भी अपने - आप को खुद्दार हीं कहता है. कुछ तो हेर - फेर है समझने में.
आम - आदमी : वह कौन ?
मैं - वही जो गरीबी की परिभाषा तय करते वक्त मंहगाई को भूल जाता है, मोंटेक सिंह आहलूवालिया.
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मैंने देखा आम आदमी पैर के अंगूठे से जमीं पर कुछ आकृतियाँ उकेर रहा है. वह समझ गया था कि जिस खुद्दारी को वह अपनी चीज समझ रहा था उसका भी पेटेंट किसी और ने करा लिया है. निराशा से उसका सर झुका जा रहा था.
................सरोज कुमार

Tuesday, 25 September 2012

किन्तु है एक टीस क्यों आये निकट ?

रास्ते अब हो चुके हैं अहलदा
किन्तु है एक टीस क्यों आये निकट ?
क्यों दुआएँ हो रहीं हैं बेअसर?
मिल नहीं पाती कोई  शहनाई बजने की खबर.

............ सरोज कुमार  

फिर भी कहते है न कोई है गिला - शिकवा मुझे


अख़बार की जो सुर्खियाँ थीं कभी, अब हैं गुमशुदा
अब शिलालेखों में छपने की जरूरत है किसे ?
आत्माएं हैं यहाँ एक - दूसरे की गिरवी,
फिर भी कहते है न कोई है गिला - शिकवा मुझे.
............. सरोज कुमार

Saturday, 22 September 2012

मैं चौराहा नहीं हूँ

मैं चौराहा नहीं हूँ
जहाँ विज्ञापन टांग दिए जायेंगे.
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चौराहे का दर्द वैश्विक है
वह बदलते पोस्टरों का चेहरा है जहाँ गरीबी नहीं झांकती
वहां प्रधानमंत्री को गाली देते लोग गर्व - पूर्वक गुजरते हैं
और यातायात पुलिस इसे मुस्कुराते हुए महसूसती है
उसे सकून है कि वह राज्य की पुलिस है देश की नहीं.
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ऐसा नहीं कि नैतिकता-प्रिय पुरुष वहाँ नहीं आते
लेकिन चुप रहकर अनेकों सवालों की इज्जत बचाना उनकी जिम्मेवारी है
अपनी सुरक्षा प्रबंधों से आश्वस्त होने के उपरांत
वे कभी - कभार किसी तथाकथित शहीद के गले में मुरझाये फूलों की माला डालते हुए
कैद कर लिए जाते हैं तस्वीरों में अख़बार की सुर्खियाँ बनने हेतु,
चौराहा मुस्कुराता है
छल को जितना वह पहचानता है उतना कोई नहीं.
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मैं यहाँ खड़ा हूँ जिसे सब चौराहा कहते हैं
मैं बस खड़ा हूँ
बस इस कारण कभी - कभी चौराहा समझ लिया जाता हूँ
मुझपर सबकी इनायत है,
उन नीतियों को
जिसे बाहर से विरोध करने के बाद अन्दर से समर्थन दिया गया
यहाँ सम्मानित किया जाना है
गुजरता हुआ आज और गुजरा हुआ कल नसीहत भर है
और आनेवाला कल
विद्रोही - बूटों से पीसने की उम्मीद में दुबला हो रहा है,
ऐसे हीं किसी वक्त में मुझे मोक्ष लेना है
कौन जाने कल यह चौराहा रहे, न रहे.
................ सरोज कुमार

Saturday, 15 September 2012

मेरे हिस्से की धूप

मेरे हिस्से की धूप
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मान  लीजिये शहरी इलाके में एक कट्ठे की परिधि में मेरा एकमंजिला आवास है. उत्तर से एक पतली सी गली है है आवागमन के लिए. शेष तीन तरफ से मेरे पड़ोसियों ने अपनी चार मंजिला इमारते खड़ी कर ली हैं. चूँकि उत्तर दिशा से कभी धूप आती नहीं, मेरे हिस्से की धूप खो गयी है या लूट ली गयी है.
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मेरे हिस्से की धूप पर मेरा अधिकार प्राकृतिक है या संविधान प्रदत्त ? मुझे पूरा विश्वास है संविधान निर्माताओं के दिमाग में यह बात नहीं आई होगी कि धूप की भी चोरी हो सकती है. अपने हिस्से की धूप को पाने के लिए मुझे किसके पास जाना चाहिए ? पुलिस के पास या अदालत के पास ?

क्रांति

क्रांति

 

भले क्रांति हो भ्रान्ति मगर यह जोश हमें दे देती है,
यह घुटकर जीने के विरुद्ध आक्रोश हमें दे देती है
एक ज्वाला - मुख बेचैन यहाँ हम सबके दिल में पलता है
'सब मौन खड़े' - बस यही सोंच वह कब से नहीं मचलता है.
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एक चीख कहीं से उठे और मातम सा शोर मचा जाये
एक चीख कहीं दब जाय और सन्नाटे का भ्रम रचा जाये
- इन दो स्थितियों में बोलो, है कौन तुम्हारा हितोपाय ?
चुप रहना सभ्य कला है तो एक चीख क्रांति का है उपाय.
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एक 'चिंतन' जैसी चीज कोई जब तक है नहीं रची जाती
'क्रांति - क्रांति' चिल्लाने से सच है कि क्रांति नहीं आती,
जब तक विकल्प तुम खड़ा नहीं कर देते हो इस 'खंडहर' का
नारों से छली गयी जनता तब तक विश्वास नहीं पाती.