Sunday, 27 January 2013

यह जीवन पथ मैं राही
कहीं कहीं छाया सघन
लेकिन विश्राम मनाहीं.
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आश की डोरी रही जबतक तनी
चाह चलने की रही तबतक बनी
आश का संबल तनिक शिथिल हुआ
पग हुए विश्रांत,
नहीं मिलता मुझे विश्राम-स्थल
ढूंढता हूँ बीथियों में मैं तृषित सा
अंक वह जिसमें लिखा सन्देश
चरैवेति - चरैवेति.
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चाह कर भी रुक नहीं पता कहीं
और चलने की रही इच्छा नहीं
पर नियति का खेल -
मैं चलता रहा.
तथ्य जीवन के मगर गुनता रहा.
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यह महज मेरी नहीं,
सबकी व्यथा है
यह नियति का खेल सचमुच है नहीं
यह मनुज के हार की सुन्दर कथा है
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और है इसका सहज परिणाम
कुछ गुनना पड़ेगा.
त्रस्त मानव के ह्रदय में
जीत का उन्माद
भरना पड़ेगा.
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एक नूतन नीति का निर्माण
फिर से सत्य का संधान
अकेले एक क्षण का कर्म है क्या ?
रे नहीं.
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इसलिए आओ चलें सब साथ मिलकर
एक का आश्रय बने हर एक.
ऐसा करें हो जाएँ पूरी
हर इच्छा मनचाही
यह जीवन पथ मैं राही.
अभी अभी कुम्भ में स्नान कर पवित्र हो चुका एक देश
मस्जिद में वजू कर रहा था
कि 'वन्दे मातरम' गाते कुछ लोग वहां से गुजरे
बाद में क्या हुआ पता नहीं
अभी एक समाचार आया है,
-
"कुछ आतंकवादी एक भूला - बिसरा गीत गाते हुए पकडे गए।"

जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप थे

जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप थे
उन्होंने भी
झंडा फहराया
और अपनी राष्ट्रभक्ति का लोहा मनवाया।

कुछ करते हैं कवि सम्मलेन

नारद को देखकर ग़मगीन
किसी द्वंद्व-चिंतन में लीन,
पूछा महर्षि व्यास ने
कैसा रहा सफ़र ? देवर्षि !
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चिंता की रेखाएं फैलीं
कनपट्टी के कोरों तक
सर्द - सनसनी हिलकोर गयी
मासामों तक पोरों तक.
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बोले कुछ भर्राए स्वर में -
"महाकाव्य का विषय नहीं यह
कविवर ! यह कलिकाल - केलि की अंतर्धारा
अख़बारों में एक दिवस का समाचार है
फिर भी सुनिए यह बुरा हाल "
है भरतखंड का यह सवाल-
अभिमन्युओं के शीश पर मंडरा रहा है काल
यहाँ सड़कों पर उतरा हुआ बचपन
चीखता चिल्लाता नारे लगाता
*मेरा 'किसलय " वापस दो
बचपन को आश्वस्त करो "
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राजभवन तक की गुहार
मानव श्रृंखला बनाई
किया मनुहार.
राष्ट्रपति को किया ई -मेल सन्देश
" बचपन परतंत्र है
भारत मना रहा गणतंत्र है."
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बच्चों ने की है भूख हड़ताल
अपहरण का फैला हुआ जाल
वे पहुंचे मुख्यमंत्री आवास
बोले- " तुम हो त्राता
कुछ तो दो उत्तर"
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वे बोले -
"अपहरण मैंने किया होता तो मेरे बस में था,
लेकिन यह तो अपहर्ताओं के रहमोकरम पर,
मैं प्रार्थना करूंगा सब ठीक हो !"
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जब मौन हुए देवर्षि
पूछा व्यासदेव ने -
" और वे क्या कर रहे ?
अभिभावक, पिता परिजन ?
"अपहर्ताओं से मोल- तोल "
-नारद जी धीमे से बोले.
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और वे बुद्धिजीवी समाजसेवी ?
वे क्या कर रहे?
व्यासदेव ने फिर से पूछा.
एक क्षण रहकर मौन, लिए विद्रूप हँसी नारद जी बोले -
" कुछ तो चंदा उठा रहे है
कुछ करते हैं कवि सम्मलेन."

Saturday, 1 December 2012

मुर्गे और आदमी में अंतर इतना हीं समझ पाता हूँ।

तौलकर साहस उन्होंने यह कहा -
"हुजूर मैं नमाजी हूँ
असल में समाजी हूँ।
चुप रहता हूँ तो खैर है
वरना किसी न किसी से वैर है।
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पहली नजर में उचक्का हूँ

सच में अन्दर तक भौचक्का हूँ
घूरेंगे सभी जब कभी
पहली बार मिलूंगा,
सरसरी तौर पर आतंकवादी लगूंगा।
फिर थोड़ी देर में सहमते - सहमते वे सहमत होंगे -
आदमी हूँ, रोजगार बस आता और जाता हूँ,
बीबी और बच्चों के इंतजार से बंधा हूँ
थोडा हीं सहीं, देश के जी डी पी का कन्धा हूँ।
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जी नहीं, इस बार टिकट नहीं मिला,
जी नहीं, कभी नहीं, क्या करूँ शिकवा -  गिला ?
जी हाँ, वोट डाल आऊंगा,
धर्म अपना निभाऊंगा,
जी नहीं, मैं नारे नहीं लगाता हूँ,
मुर्गे और आदमी में अंतर
इतना हीं समझ पाता हूँ।
जी, मजहब से बडा देश नहीं,
इससे बड़ा परदेश नहीं।"
................  सरोज कुमार


Saturday, 27 October 2012

चेतना

एक जीवन से दूसरे जीवन में जाते हुए हम यहाँ से वहाँ क्या ले जाते हैं ?
- चेतना.
- और अनुभव ?
- चेतना और अनुभव में क्या फर्क है ?
- चेतना पूर्व अर्जित ज्ञान है और अनुभव इस जीवन में अर्जित ज्ञान. दूसरे जीवन में जाते हुए हम इनका योग ले जाते हैं और वहाँ उसे बस चेतना कहते हैं.
- तो इस यात्रा में चेतना हमेशा बढती जाती होगी. घटती नहीं होगी ?
- इस प्रश्न का उत्तर इस पर निर्भर है कि इस यात्रा में प्राण उर्जा वितरित हुई या नहीं.
- क्या मतलव ?
- मतलव यह कि इस यात्रा में प्राण - उर्जा ठीक वैसे हीं बँटती  है जैसे एक कोशिका बँटकर दो कोशिकाएँ हो जाती है. प्राण - कोष के विभाजन का हीं नाम मृत्यु है. लेकिन यह अतीन्द्रिय है.
- तो यह एक तरह से चेतना का फैलाव है ?
- हाँ. जन्म और जीवन इसके साधन.
- तो चेतना कब तक फैलती रहेगी ?
- यह एक निरर्थक प्रश्न है क्योंकि दूसरे तरीके से भी चेतना का फैलाव होता है और इसके घनीभूत होने कि भी प्रक्रिया चलती रहती है. काल जैसे और भी कई आयाम हैं और इसके मापन की और भी कई विधियाँ विकसित की जा सकती हैं अथवा की जा चुकी हैं.

Thursday, 27 September 2012

आम आदमी और मैं

आम आदमी : राम -राम भाई !
मैं - राम राम ! कांग्रेस वालों के यहाँ से कब लौटे ?
आम आदमी : मैं कहाँ गया था उनके पास ? मैं तो सुबह से पत्थर तोड़ रहा था.
मैं : लेकिन कांग्रेस वाले चिल्ला रहे थे - "कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ " तो मैंने सोंचा तुम उनसे हाथ मिला रहे होगे.
आम आदमी : आप भी साहब बहुत घुमा कर फेंकते हो ? मैं तो जरूरत बस आपसे मिलने चला आया ?
मैं : मुझसे क्या जरूरत आन पड़ी. रहने के लिए इंदिरा आवास, खाने के लिए कम कीमत का अनाज, जवाहर रोजगार योजना से रोजगार बाल - बच्चों के लिए मुफ्त का सरकारी स्कूल, दोपहर की खिचड़ी, समाचार के लिए रेडिओ और टेलीविजन सब कुछ तो दे रही है सरकार और कभी बीमार पडो तो तीस हजार तक का स्वास्थ्य बीमा, अब इसके अलावे कौन जरूरत आ पड़ी ? और भी कई योजनायें है - जननी सुरक्षा योजना, मुफ्त कंडोम से लेकर मुफ्त आपरेशन ऊपर से दवाई का खर्चा और - और भी बहुत कुछ मुझे तो सब मालूम भी नहीं .
आम आदमी : मैं ईमानदार आदमी हूँ साहब, मुझे गाली मत दिया करो. मैं मुफ्त का माल हराम का समझता हूँ. बस मजूरी से जो मिलता है उससे जी लेता हूँ.
मैं : लेकिन ये योजनायें तो तुम्हारे हक़ की चीज है. कानून सम्मत है. हराम का कैसे ?
आम आदमी : हक़ की चीज होती तो लाइन लगाना नहीं पड़ता, मुखिया की जी हुजूरी नहीं करनी पड़ती, और जब वे वोट मांगने आते तो यह नहीं गिनाते की चापाकल लगवा दिया तुम्हारे दरवाजे पर और बी . पी. एल में नाम लिखवा दिया. आप नहीं जानते साहब तब कितना बुरा लगता है जब वे अपनी दयानतदारी दिखाते हैं. लगता है दुनिया का सबसे दबा हुआ आदमी मैं हीं हूँ.
मैं : तो तुम क्या चाहते हो ?
आम आदमी - बस यही कि मुझे आम से खास बनने का रास्ता बता दो. वे मेरे हिस्से से कमीशन भी काट लेते हैं और अहसान भी जताते हैं.
मैं : मतलब ?
आम आदमी : यह कि मेरे हिस्से की चीज सीधे मेरे हाथ में थमा दो.
मैं : तो तुम्हारा खाता नहीं खुला क्या ?
आम आदमी : आप फिर नहीं समझे मेरी बात. मेरे श्रम का उचित मूल्य नहीं मिलता. पूरे दिन ईमानदारी से जी - तोड़ मेहनत करने पर भी मुझे सरकार के आगे हाथ फैलाना पड़ता है. मेरे दिन भर के श्रम का उचित मूल्य मिल जाता तो मुझे हाथ क्यों फैलाना पड़ता ?
मैं : इसका मतलब यह कि तुममे खुद्दारी जग रही है. लेकिन वो जो तुम्हारे श्रम का मूल्य चुराता है वह भी अपने - आप को खुद्दार हीं कहता है. कुछ तो हेर - फेर है समझने में.
आम - आदमी : वह कौन ?
मैं - वही जो गरीबी की परिभाषा तय करते वक्त मंहगाई को भूल जाता है, मोंटेक सिंह आहलूवालिया.
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मैंने देखा आम आदमी पैर के अंगूठे से जमीं पर कुछ आकृतियाँ उकेर रहा है. वह समझ गया था कि जिस खुद्दारी को वह अपनी चीज समझ रहा था उसका भी पेटेंट किसी और ने करा लिया है. निराशा से उसका सर झुका जा रहा था.
................सरोज कुमार