एक जीवन से दूसरे जीवन में जाते हुए हम यहाँ से वहाँ क्या ले जाते हैं ?
- चेतना.
- और अनुभव ?
- चेतना और अनुभव में क्या फर्क है ?
-
चेतना पूर्व अर्जित ज्ञान है और अनुभव इस जीवन में अर्जित ज्ञान. दूसरे
जीवन में जाते हुए हम इनका योग ले जाते हैं और वहाँ उसे बस चेतना कहते हैं.
- तो इस यात्रा में चेतना हमेशा बढती जाती होगी. घटती नहीं होगी ?
- इस प्रश्न का उत्तर इस पर निर्भर है कि इस यात्रा में प्राण उर्जा वितरित हुई या नहीं.
- क्या मतलव ?
-
मतलव यह कि इस यात्रा में प्राण - उर्जा ठीक वैसे हीं बँटती है जैसे एक
कोशिका बँटकर दो कोशिकाएँ हो जाती है. प्राण - कोष के विभाजन का हीं नाम
मृत्यु है. लेकिन यह अतीन्द्रिय है.
- तो यह एक तरह से चेतना का फैलाव है ?
- हाँ. जन्म और जीवन इसके साधन.
- तो चेतना कब तक फैलती रहेगी ?
-
यह एक निरर्थक प्रश्न है क्योंकि दूसरे तरीके से भी चेतना का फैलाव होता
है और इसके घनीभूत होने कि भी प्रक्रिया चलती रहती है. काल जैसे और भी कई
आयाम हैं और इसके मापन की और भी कई विधियाँ विकसित की जा सकती हैं अथवा की
जा चुकी हैं.
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