Sunday, 13 October 2013

कविता ने कवि से लाकर पाठक को क्या दिया ?

कविता ने कवि से लाकर पाठक को क्या दिया ?
जो भी दिया सरकार मेरे अहसास हीं तो था.

मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?

मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?
नहीं नहीं ऐसा मत करना.
मुझपर, यह उपकार तुम्हारा.
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यह एकांग बनेगा तो तुम स्वामी बनना चाहोगे
और स्नेह के बदले में अपनी पूजा करवाओगे
मैं तो कटु - मधु दोनों में आजाद ख्यालों का पंछी.
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मैं विलुप्त सरिता का रज - कण
मुझमें नीरवता का क्रंदन
मुझे रौंद अपने चरणों से तुम अपने घर को चल दोगे.
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मुझे स्नेह से बांध सकोगे ?
नहीं-नहीं ऐसा मत करना
मैं उपकार नहीं ले सकता.

चाहत का रंग कैसा था ?

आज कौन आई ?
सोया था मैं
पता नहीं पाया.
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कोसों की थकन
चूर हुईं सांसें
बिखरी हुई आसें
चुका नहीं पाईं
सरक गया अवसर
हाथ छूंछा
गया नहीं पूछा
कि चाहत का रंग कैसा था ?

.............सरोज कुमार