............क्योंकि मैं सोंचता हूँ.
Saturday, 9 March 2013
बहुत शोर है लोकतंत्र के मंदिर में भई
बहुत शोर है लोकतंत्र के मंदिर में भई
बेबा रोती कहीं, कहीं पर रोते बच्चे,
कुछ हैं जो आश्वासन पाते,
कुछ तो बस रोते रह जाते
कुछ हैं जो बस कफ़न बेचते
कुछ हैं बस कहकहे सेंकते।
आएगी एक दिन वह आंधी भी आएगी,
कोलाहल से ऊब चुकी ये रातें भी सो जायेंगी।
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